शेयर 🤗 #विद्याधरसेविद्यासागर (किताब)😍
आत्माकीअनुगूँज :
“मुझे पढ़ना हैं। मुझे कुछ सीखना है। मुझे कुछ कहना है मुझे कुछ खोजना है। मुझे साहित्य जानना है। साहित्य का वैभव पहचानना है। मुझे व्याकरण के आधार बिन्दु जानना है मुझे संस्कृत भाषा में परिपक्व होना है। मुझे अपभ्रंश बोली के संकेत देखना है। मुझे आत्म विकास करना है। मुझे मस्तिष्क पर ज्ञानगंगा धारण करना है। मुझे चरित्र का समुद्र पार करना है। मुझे तपस्या का मरुस्थल हरित करना है। मुझे सेवा का संपूर्ण भार उठाना है। मुझे गुरु आज्ञा पर ही चलना है। मुझे गुरु के इंगित पथ पर ही रहना है”-
कच्ची उम्र के विद्याधर के मानस में पक्के विचारों का उदय हो पड़ा था। उन्हें बहुत कुछ करना है, वे जानने लगे थे। उन्हें जो करना था वह इसलिए सरल जान पड़ता था कि उन्हें ज्ञानसागरजी जैसे गुरु का वरदहस्त मिल गया था प्यासे को समुद्र सा भटके को दीप-सा भूले को पथ-सा।
विद्याधर का मंतव्य ज्ञानसागरजी की समझ में आता जा रहा था, उनके कर्मठ हाथ ज्ञानसागरजी की गठिया से पीड़ित कोहनियों को मलते कभी घुटने को कभी कमर को तो कभी पगतलों को श्रद्धा से लबालब भरी हथेलियों का स्पर्श वह सब कह देता, जो संकोच भरे विद्या के अधर न कह पाते।
राजस्थान की तीव्र ग्रीष्म से झुलसा आदमी आदमी रात को आँगनों में बरस रही ठंडक में सोने-लेटने बेचैन रहता, तब विद्याधर जैसा सरलस्वभावी शिष्य अपने गुरुवर के कक्ष की गरमी से जूझ रहा होता। गुरुवर गठियावात के कारण खुले आकाश के नीचे न सो पाते, पड़े रहते बंद कमरे में बात की तड़पन और मौसम की तपन सहते। ऐसे में विद्याधर गुरु को बंद कमरे में छोड़ खुली हवा का सुखद स्पर्श कैसे करते ?
गुरुभक्त विद्या उनके मना करने पर भी काया के सुख को प्राप्त करने प्रांगण का खुला वातास अस्वीकार देते और भट्टी की तरह तपे कक्ष में रात भर रुककर टहल संपन्न करते । गुरुवर कहते-“ जा तू बाहर सो जा। दिन भर की तीव्र तपन के बाद ठंडक के मंद झोंके मिल ‘विद्याधर गुरुवर के शब्द सुन मुस्काते रहते, फिर कहते- मुझे आपके पास रुकने से न गर्मी लगती, न ठंड, आप निश्चिन्त रहें, मैं ठीक हूँ।
प्यारे शिष्य का आदर भाव एवं सेवा भाव देखकर चकित थे वृद्ध ज्ञानसागर कहते तू वैद्य बन कर आया है मेरी वैयावृत्ति के लिए।
सेवा, आदर, श्रम, विनम्रता, लगन, निष्ठा और निष्कपटता रोज रोज पाते विद्या के स्पर्श में गुरु हो गये निहाल देते रहे अपने सामीप्य का लाभ करने लगे हृदय हृदय की चर्चा सींचने लगे एक मस्तिष्क का अमृत दूसरे पर।
पोस्ट-74…शेषआगे…!!!
