विद्याधर से विद्यासागर

*☀विद्यागुरू समाचार☀* विद्याधर से विद्यासागर

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सदलगाकामोह-राग :

श्रवणबेलगोला की शीतांश हवाएँ चल कर सदलगा के मंदिरों से टकराई। मंदिर में जनकंठ मुखरित हो पड़े- विद्या उत्तर की ओर चला गया ! समाचार मंदिरों से घर-दर-घर फैल गया। सदलगा के लोगों पर बेलगोला का जादू कम सा हो पड़ा, वहाँ जब विद्या नहीं तो ?

मारुति, राजकुमार, पुण्डलीक, शिवकुमार और तम्हा जैसे प्रियजन उस रोज एक दूसरे की चोरी से अश्रु पोंछते रहे और अपने को धन्य मानते रहे। उनके बीच का एक व्यक्ति इतना निर्मोही निकला कि सबको छोड़कर उत्तर में जा पहुँचा अजमेर। और वे इतने मोही कि सब इकट्ठे/ साथ-साथ रहते हुए भी दुखी हो पड़े ‘एक’ के लिए।

मोह ने सभी पर जादू चला रखा था, तभी तो मंदिर का घंटा बजता तो श्रीजी को लगता जैसे उससे निकली ध्वनि पुकार रही हो विद्या… विद्या शिवकुमार कार का हार्न बजाते तो हार्न में विद्या शब्द ध्वनित होता लगता। मारुति खेत में किसी को पुकारता तो उसकी आवाज ‘विद्या’ बनकर लौट आती उसी के कानों में।

शांता और सुवर्णा विद्या की किताबें कंघी, शीशा देखती तो बुदबुदाती ‘विद्या भैया की है’।

मल्लप्पाजी का देहात्म भी बेहाल हो गया था। जब भी वे महावीर, अनन्तनाथ या शांतिनाथ को बुलाते तो मुँह से निकल पड़ता ‘विद्याधर’ फिर भूल को ठीक करते और अन्य नाम को उचारते। सब एक दूसरे को देखते रह जाते।

पोस्ट-73…शेषआगे…!!!

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