शेयर 🤗 #विद्याधरसेविद्यासागर (किताब)😍
विद्याधर पढ़ने-लिखने सीखने में बचपन से ही होशियार थे। कुशाग्र बुद्धि। उन्होंने अपने ज्ञान और विवेक जन्य श्रम से मुनि ज्ञानसागर को ऐसा प्रभावित किया कि मुनि श्री अपने अंतस् का संपूर्ण अध्यात्म, संपूर्ण साहित्य, संपूर्ण ज्ञान उनके हृदय रूपी गमले में उड़ेल देना चाहने लगे।
उनके सान्निध्य में विद्याधर नित-नवीन विद्याएँ अर्जित करने लगे। साधना और आराधना का कठिन पथ उन्होंने हृदय से स्वीकार जो कर लिया था। रात दिन चिंतन मनन चलता। व्रत-उपवास चलते और चलती रहती पल पल गुरु भक्ति, गुरु-सेवा, गुरु-टहल ।
दशलक्षण पर्व प्रारम्भ हो चुका था। पू० ज्ञानसागरजी ने विद्याधर से कहा- तत्त्वार्थसूत्र का पाठ करो। विद्याधर को सूत्रजी अच्छी तरह से याद थे, अतः वहीं बैठकर उन्होंने बोलना प्रारम्भ कर दिया।
ज्ञानसागरजी चकित कि इसने हाथ में पुस्तक नहीं ली, अब बीच में फिर उठना पड़ेगा इसे पुस्तक के लिए।
पर उनके लगातार मौखिक बोलते चले जाने के क्रम से गुरुजी प्रसन्न हो गए और उपस्थित दर्शक श्रोता भक्त श्रावक हो गए हर्षित उनकी चातुरी से।
विद्याधर की यात्रा ‘बिन्दु’ से ‘सागर’ की ओर हो पड़ी और ज्ञानसागरजी का मन ‘समुद्र’ से ‘बिन्दु’ की ओर हो पड़ा। बिन्दु सिन्धु में समाहित होना चाहता था। सिन्धु बिन्दु को अपने में समेट लेना चाहता था । अजमेर की धरती पर गुरु शिष्य की सात्विक परम्परा जन्म लेने बेचैन थी। अजमेर के आकाश से ज्ञानामृत बूँद-बूँद बरस जाने आकुल था।
पोस्ट-72…शेषआगे…!!!
