विद्याधर से विद्यासागर

*☀विद्यागुरू समाचार☀* विद्याधर से विद्यासागर

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चातुर्मास स्थापना का समय सामने आ गया है। देशभूषण महाराज ससंघ किसी स्थान की ओर चल देने का विचार ले आये हैं मन में वे संघ को आदेश प्रदान करते हैं। संघ ऊंची नीची जमीन पाकर श्रवणबेलगोला से कुछ ही दूर पहुँचकर ठहर जाता है एक स्थान पर इसे ‘स्तवनिधि क्षेत्र’ कहते हैं।

स्तवनिधि के वातास में भी उतना ही चैन घुला था, जितना श्रवणबेलगोला में था। संघ रम गया देशभूषण महाराज के साथ-साथ उनके संघ के सभी सदस्य तप, आराधना और व्रतों में तल्लीन हो गये। युवा योगी विद्याधर का यह क्षेत्र पूर्व से ही जाना माना है। वहाँ का चप्पा चप्पा उनसे परिचित है अतः वे पर्वत पर तो कभी मंदिर में ध्यानमग्न हो जाते हैं। सारा क्षेत्र उनके भीतर झूमता रहता है, वे सारे क्षेत्र पर झूमते हुए चर्या सम्पन्न कर रहे हैं।

व्यवस्था का राजमार्ग नहीं : स्तवनिधि की उत्तुंग चोटियाँ, हरित भूमियाँ और विभिन्न प्राकृतिक घटाये बीस वर्षीय विचारशील युवक को अपने आगोश में समेटे प्रसन्न थी। युवक भी आचार्य श्री देशभूषण महाराज की पद रज से पुष्प सा खिल उठा था।

विद्याधर अपनी चर्या को संकल्पों के सूत्रों से बांध देना चाहते थे। वे सोचते, उन्हें ब्रह्मचर्य व्रत प्रदान कर दें आचार्यश्री, तो लक्ष्यपूर्ति की ओर यात्रा हो पड़े, परन्तु आचार्य देशभूषण कुछ और ही सोच रहे थे विनम्र, हृष्ट-पुष्ट आज्ञाकारी किन्तु निर्भय, अन्वेषी किन्तु स्वकेन्द्रित युवक विद्याधर मुनिपथ से पृथक् भट्टारक पथ का अनुगामी बने। गादी विशेष का नियंत्रण यह खूब खूब कर सकता है।

परखने की दृष्टि से वे संघ की देख-रेख एक मायने में बागडोर, इसी युवक को सौंप चुके थे। मगर अध्यात्म-सागर में डुबकी लगाने का इच्छुक युवक, व्यवस्था के अपवादमार्ग पर चलने राजी कैसे होता ! उसे तो मुनि बनना था। उसे मुनि पथ चाहिए था।

पोस्ट-64…शेषआगे…!!!

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