विद्याधर से विद्यासागर

*☀विद्यागुरू समाचार☀* विद्याधर से विद्यासागर

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सेवाऔरतपस्या :

देशभूषण महाराज अस्वस्थ रहने पर कभी-कभी डोली से चलते थे। उनकी डोली को कांधा देने कुछ स्वस्थ युवक तैनात किये गये थे, परन्तु आम श्रावकों की भी इच्छा रहती कि कुछ दूरी तक ही सही, उनके कंधों पर भी डोली का भार आये। यही सोचते थे उनके शिष्य । मगर विद्याधर नाम के शिष्य ने सोचने से आगे ‘कर्तव्य’ को अधिक जिया। अतः जब भी विचार आता, वे डोली का एक सिरा अपने बलिष्ठ स्कंध पर धारण कर मीलों का फासला तय करते लोग हँसकर कहते यह सेवा नहीं है, तपस्या का एक अंग है, सभी को करना चाहिए।

एक शाम, श्रवणबेलगोला के समीप की ही बात है, विद्याधर डोली धरकर बैठ ही रहे थे कि उन्हें बिच्छू ने डंक मार दिया। देखते ही देखते वे पीड़ा से छटपटाने लगे। तभी उन्हें याद आया कि कालान्तर में मुनि होना है, दर्द सहने का पाठ अभी से सीख लेना चाहिए। उन्होंने संघस्थ सदस्यों द्वारा किया जाने वाला उपचार स्वीकार नहीं किया और वही मैदान में एक चटाई लेकर लेट गये। “दर्द को सहना और किसी से न कहना” का प्रथम पाठ विद्याधर ने यहाँ पर सीखा था। वे रात भर मौन रहकर चटाई पर डले रहे। दर्द की तीव्रता इतनी बढ़ गई कि आँखों से निरंतर अश्रु हरकते रहे। देशभूषण महाराज को उनकी चिन्ता हो आई, पर वे भी क्या करते, विद्या नाम के युवक ने कष्टों के लिये और उन्हें जीतने के लिए ही, जन्म लिया था।

उनके इस प्रयास की प्रशंसा संघस्थ सदस्यों ने हृदय से की। सही बात तो यह है कि सभी ने शिक्षा भी ली। सब विद्याधर की तरह सहनशील और आत्मस्थ बन जाना चाहते थे। विद्याधर जो उनके समक्ष काफी छोटे, मात्र २० वर्ष के युवक थे, प्रेरणा के महान् स्रोत बन गये थे।

मुनिपथ पर बढ़ने और साफल्य पाने के संकेत उनके जीवन में यहां स्पष्ट हो चुके थे।

रात से सुबह हो गई। विद्याधर सभी के साथ सभी की तरह प्रसन्न चातुर्मास स्थापना का समय सामने आ गया है। देशभूषण महाराज थे।

पोस्ट-63…शेषआगे…!!!

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