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मगकासूत्रधार : पिक्चर देखता है तो नाटकों की ओर खिंचाव होगा ही। “हाँ नाटक भी बहुत पसन्द करता है।” देखते देखते वह उनका पात्र भी बनने लगता है। एक नाटक में सूत्रधार का कार्य किया तो पुरस्कार जीत कर ले आया।
‘सूत्रधार’ शब्द के उच्चारण पर महावीर बाबू की आँखें चमक
पड़ती हैं। वे जान गये कि सामान्य नाटक में सूत्रधार बनने वाला यह पात्र,
अघ संसारी नाटक का सूत्रधार बनने चल पड़ा है देशभूषणजी के पास। अनुज अनन्तनाथ ने भी उस रोज अपनी आँखों से एक फिल्म देखी। वे देखते है ‘भैया’ विद्याधर साइकल से निपानि जा रहे हैं, यह सदलगा से सत्ताईस किलोमीटर हैं। दूरी सुनकर मैं रुक गया हूँ। वे निपानि चले गये हैं। वहाँ संत विनोबा आये हैं। पंद्रह वर्ष की उम्र से महापुरुषों के दर्शनों की तीव्र लालसा उस लालसा का अर्थ अब समझ में आ रहा है। ऐसे ही तो एक बार तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू का आगमन हुआ था सांगली में विद्या भैया सबसे पहले भागे थे उन्हें देखने। सही मायने में ‘समझने’ ।
अनन्तनाथ आगे देखते हैं कि जब वे बारह वर्ष के थे, उन्हें भोजन करना और खेलना कूदना ही अच्छा लगता था शेष किसी कार्य में जी नहीं लगता था माता पिता व बड़े भाईसाब रोज-रोज धार्मिक किताबें पढ़ने की सीख देते रहते, वे इस कान से सुनकर उस कान से निकाल देते। एक दिन वे विद्याधर के सामने पड़ गये, विद्या कहते हैं “तुझे णमोकार मंत्र भी तो आता नहीं चल, पहले उसे याद कर”। बोले विद्याधर- णमो अरिहंताणं फिर अनन्त को दोहराने को कहा। देखते ही देखते णमोकार मंत्र याद हो गया। बाद में शांतिनाथ को भी याद करने कहा। शान्ता व सुवर्णा को करा ही चुके थे।
कुछ दिनों में ही भूतकाल, भविष्य और वर्तमान चौबीसी के नाम रटाये। ‘वे पीछे पड़ गये तो हम आगे बढ़ गये, सीख गये पोथी पत्रा पढ़ना, याद करना और उन पर चर्चा करना प्रभावना ने जोर पकड़ा तो धीरे-धीरे हम सब शाम को जाप देने लगे। संध्या सामायिक करने लगे। अनन्त नाथ को लगा कि क्षणभर को वे पुनः पुराने स्थान पर बैठे णमोकार मंत्र कह रहे हैं, विद्याधर उनसे कहला रहे हैं।
जाने क्या हो गया उस रोज लोगों को शांतिनाथ भी अपनी फिल्म में विद्या के अतीत को निहार रहे थे। वहीं हाल था सुवर्णा का जितनी आँखें, उतने दृश्य।
अंतिम दृश्य सबका एक जैसा था एक ऐसी छबि जो तीन माह की उम्र में ‘पीलू’ कहलाती थी, तीन वर्ष की उम्र में ‘मकराने की मूर्ति’ कहलाने लगी, चार वर्ष में ‘मरी’ कही जाने लगी और पाँच वर्ष में ‘गिनी’ हो गई। वह छवि अब विद्याधर के नाम से देशभूषण महाराज के सामीप्य में हैं, श्रवणबेलगोला में, जिसे लग रहा वर्षों से नहीं देखा। (मरी अबोध बालक, शिशु (कर्नाटक की बोली में) । गिनी – तोता ।)
पोस्ट-62…शेषआगे…!!!
