पुण्योदय नसियां जी कोटा
*निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव मिथ्यात्व भंजक108 श्री सुधासागर जी महाराज ने प्रवचन मे कहा
संसार बड़े पापीयो की बदोलत चल रहीं हैं जीव का मन वचन काय भी पाप से भरी ऐसे एक इन्द्रीय जीव संसार को चला रहे हैं
1.नौकर की सोच नौकर जैसी-चक्रवर्ती व देवताओं का ऐसा पुण्य होता है कि उन्हें कोई मार नहीं सकते उनके सब सेवक होते हैं वाहन जाती आदि होते हैं फिर भी वे सब चीजों में सक्षम हैं झाड़ू लगाने वाली की उपयोगिता समझो कोटा स्टेशन की दो तीन वर्ष पहले की घटना नौकर ने ही पुरे परिवार को मार दिया तुमने उपयोगिता नहीं समझी छोटा आदमी का सोच छोटा ही होगा सब धन्य हो जाओ तुम जितने बड़े होते जाओ उतना दुसरो का सहारा लेना छोड़ो
बड़ो का सहारा लो छोटो का नहीं
बड़ो का सहारा लो बड़े हमे सदा सहारा देते हैं जब जब तुम्हारे मन में ये भाव आये ये वस्तु ये व्यक्ति मेरी जिदंगी में आये समझ लेना कि तुम्हारा यही से विनाश शुरू हो गया
2.पंच स्थावर-कर्म चेतना कर्म फल चेतना एक इन्द्रीय जीव सबसे बड़े पापी है निकृष्ट से निकृष्ट पाप करता है वह स्थावर बनता है संसार के सबसे बड़े पापीयो की बदोलत चल रहीं हैं जीव का मन वचन काय भी पाप से भरी ऐसे एक इन्द्रीय जीव संसार को चला रहे हैं जो हम साँस लेते है ये ही तो वायुकाय के बदौलत जिंदा है एक देश का नेता प्रधानमंत्री जिसकी जिदंगी एक ड्रायवर के हाथ में है बाडीगार्ड के हाथ में है छोटा सा वेतन मिलता है
3.व्यवस्था-छ काल है इन छःकालो में कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है कि सिर्फ धर्मात्मा ही रहेगा इस तीन लोक में कोई स्थान व समय ऐसा नहीं है।तुम वस्तु को समझो तुम वस्तु की उपयोग को मत समझो
4.कम से कम-इसके विना चल जाये तो समझ लेना कि ये वस्तु मेरे जीवन में आ जाये तो मजा आ जाये और साधु सोचता था कि मैं इस वस्तु से दुर हो जाये तुम कोई चीज छोड़ो मत सोचो मैं किसी से कुछ छुड़ाता नहीं हूँ सोचने के लिए कहता हूँ महावीर ने सोच बदल उठते ही क्या खोजोगे मंजन मिल जाये तो मजा आ जाये और साधु कह रहा कि मंजिल के बिना चल जाये तो मजा आ जाये उठते ही भाव आ जाये जरा दर्पण तो देख लू सुबह इतनी आकुलता दर्पण तो देख लू ऐसा कोनसा पाप हो गया रात भर में ऐसी कोई सी बात हो गई जो दर्पण देखने के लिए मन तड़प गया
5.नहाने-जिसने कभी अपना चेहरा कभी देखा नहीं उसके दर्शन करने को दौड़ पड़ते हो यही साधु हे भगवान ऐसी जिदंगी हो जाये कि जिसमें मुझे नहाना ना पड़ें हमें भगवान के अभिषेक के लिए महाराज जी को आहार देने के लिए नहाना ना पड़ें हम लोग ये भावना भाते है कि जिदंगी में कभी नहाना ना पड़ें तुम्हें आहार देने के लिए नहाना पड़ता है हम लेने के लिए नही नहाते हे भगवन मैं ऐसा पवित्र कब बनु जो बिना नहाये भी भगवान को स्थान छू ले।
प्रवचन से शिक्षा-इसके बिना चल जाये तो मजा आ जाये आज का मंत्र ले जाओ
सकंलन ब्र महावीर विजय धुर्रा 7339918672 परम गुरु भक्त 13जुलाई2021
नमनकर्ता-सौरभ,अंकिता हीरा जैवलर्स गाडरवारा
पुज्य सुधासागर जी के प्रवचनांश व अमृत सुधावाणी के लिए जुडे
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