संस्मरण😍

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संस्मरण😍 #वीतरागमुद्राबिनाबोलेउपदेशदेतीहै🤗– मुनिश्री #अजितसागर जी महाराज🙏

सिद्धक्षेत्र #मुक्तागिरी जी की बात सन्-1990 के चातुर्मास बात है एक दिन आचार्य श्री जी के साथ दो तीन महाराज के और हम उस समय ब्रह्मचारी अवस्था(ब्र.विनोद ) में था, उस दिन सुबह आचार्य भक्ति के बाद शौचक्रिया के खरपी रोड पर एक नाला था वहां पर गए थे, किनारे पर झाडियाँ की ओट में आचार्य श्री शौच क्रिया को बैठे उसे थोडा आगे हम भी बैठे, इसी दौरान एक अद्भुत प्रसंग देखने को मिला- एक नेवला उसके साथ एक छोटा नेवला था दोनों ने आचार्य श्री जी को देखा वह थोड़ी दूरी पर जाकर अपने साथी नेवले के देख रहा है। प्राय: नेवला आदमी को देखते भागते है पर आज ऐसा नहीं हुआ। हम बहुत ध्यान से देख रहा था, वह नेवला वही पर बैठ गया। आचार्य श्री जी आये नाले में एक चट्टान थी उस पर बैठकर हाथ धो रहे थें। हम आचार्य श्री जी के पास आये आचार्य श्री जी को बताया देखो आचार्य श्री जी सामने वो दो नेवला बैठे-बैठे आपको देख रहे हैं। आचार्य श्री जी बोले यहीं तो इनका घर है और वो तो संज्ञी हैं और हमारे जैसा सोचने वाला भी है, बस वे हमारे तरह बोल नहीं सकते हैं। हमारे मन प्रश्न आया- आचार्य श्री जी ये भी मन वाले हैं इन्हें भी सम्यग्दर्शन हो सकता है?

आचार्य श्री बोले – अरे बहुत से उदाहरण आगम में मिलते हैं सम्यग्दर्शन के साथ अणुव्रत एक देश संयम भी होता है। हमने आचार्य श्री जी का पुनः ध्यान उन नेवलो की और ले गए देखें एकटक दोनों आपको देख रहे हैं।

आचार्य श्री जी देखा और बोले – ये हम देखकर डर नहीं रहे हैं और कोई दूसरा होता तो भाग जाते। ये सिर्फ इस वीतराग मुद्रा का प्रभाव है। हमने आचार्य श्री जी आपका का प्रभाव है हिंसक प्राणी आप को देख कर सब कुछ भूल जाते हैं जैसे यह नेवला आपको ही देखे जा रहा है। आचार्य श्री जी बोले – कभी इसे किसी भव में मुनिराजों की संगति की होगी इसलिए आज यह मुनियों को देख कर डर नहीं रहा है,और आगम में कहाँ है “वीतराग मुद्रा बिना बोले जनसमूह को उपदेश देती है” बोलकर के उपदेश तो कुछ समय के होते हैं लेकिन यह वीतराग मुद्रा तो हर क्षण उपदेश दिया करती है।

साधु के पास अगर सबसे महत्वपूर्ण अगर कोई चीज है तो वो है मुनि की मुद्रा रुप वीतराग स्वरुप है इसलिए साधु को अपनी मुनि मुद्रा की गरिमा बनाए रखना चाहिए। आचार्य श्री जी हाथ धोने के बाद कायोत्सर्ग किया जैसे रोड पर आये बहुत सारे श्रावक लोग खड़े थे पैर छून लगे धकामुक्की करने लगे।आचार्य श्री जी बोले ये दर्शन का तरीका नहीं दूर से भी कर सकते हैं ।रास्ते में चलते समय हमने सोचा आज लोग भक्ति तो करते पर विवेक हीन भक्ति हो रही, ऐसी गुरुभक्ति नहीं हो जिसमें गुरु जी को कष्टदायक हो विकल्प का कारण हो।

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