परम पूज्य प्रात: स्मरणी श्री १०८ प्रथम गणाधिपति-प्रथम गणधराचार्य-निमित्त ज्ञानी-शताधिक मुनि-आर्यिका-दीक्षा प्रदाता-दीर्घ तपस्वि सम्राट-अष्ट व्यंतर-भवन वासी देवों से परि पूजित-अध्यात्म शिरोमणि-समव सरणरक्षक ९६ क्षेत्रपाल-लघु विद्यानुवाद आदि शताधिक ग्रंथ रचयिता-२० आचार्यों के विद्यमान जेष्ठ-श्रेष्ठ गुरुनां गुरु-आर्ष परंपरा रक्षक-मोक्ष मार्ग पथ गामी-पुरोहित हित रक्षक-बृहत् त्रिलोक महा मंडल आराधना के प्रेरक-कुंथु गिरि-निश्चय गिरि-गौतम ऋषि गिरि-नवग्रह तीर्थ-णमोकार तीर्थ के निर्माण के प्रेरणा स्रोत,अभिनव भद्रबाहु—कुंथु सागर जी के चरणों में त्रिकरण शुध्दी पूर्वक नमोस्तु – नमोस्तु- नमोस्तु.।
