आचार्य भगवन्त श्री सुनिलसागर जी गुरूराज द्वारा मार्गदर्शित साहित्य ‘ब्राह्मी लिपि चंद्रिका’ को दिल्ली राज्य सरकार ने अपने सभी विद्यालयों के ग्रन्थालयो में करि अनिवार्य

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आचार्य भगवन्त श्री सुनिलसागर जी गुरूराज द्वारा मार्गदर्शित साहित्य ‘ब्राह्मी लिपि चंद्रिका’ को दिल्ली राज्य सरकार ने अपने सभी विद्यालयों के ग्रन्थालयो में करि अनिवार्य-

भारत की पावन वसुंधरा की करोड़ो वर्ष पूर्व की सबसे प्राचीन ब्राह्मी लिपि जिसके ज्ञाता प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव भगवान ने अपनी पुत्री ब्राह्मी को शिक्षित किया था।

भगवान आदिनाथ ने अपने दोनों पुत्रियों को लिपि व अंक सहित विविध कलाओ का ज्ञान देकर बेटी पढ़ाओ व बेटी सम्मान का एक सुंदर सन्देश सारे विश्व को करोड़ो वर्ष पूर्व दिया

वर्तमान में अहिँसा प्रभावना सम्राट चतुर्थ पट्टाचार्य श्री सुनिलसागर जी गुरूराज जो कि प्राकृत भाषा के साथ साथ इस अतिप्राचीन लिपि में दक्ष है,वे अपने संघ के समस्त साधुओ को इस लिपि की शिक्षा देते है

सम्पूर्ण विश्व को इस प्राचीन भारतीय पवित्र लिपि से बोध कराने पुज्य आचार्य श्री के मार्गदर्शन में भारतीय विद्यापीठ द्वारा ‘ब्राह्मी लिपि चंद्रिका’ साहित्य का प्रकाशन किया गया जिसका अर्थ पूण्य श्री मित गलालिया परिवार ठाकरडा ने किया

इस साहित्य का प्रथम विमोचन 7 जून 2019 को राजस्थान की भीलूड़ा नगरी के पँचकल्याणक महामहोत्सव में पुज्य आचार्य श्री सुनिलसागर जी गुरूराज के आशीष सानिध्य में किया गया

साहित्य ‘ब्राह्मी लिपि चंद्रिका’ को सम्पूर्ण राज्यो के ग्रन्थागारो तक पहुचाया गया व हर जगह इसकी महत्ता को सर्वोच्च रखा गया जब इस ‘ब्राह्मी लिपि चंद्रिका’ को दिल्ली राज्य के शिक्षा विभाग को दिया गया तो उन्होंने भारतीय संस्कृति के प्राचीनतम ज्ञान पर गौरवान्वित होकर दिल्ली राज्य के सभी विद्यालयों के ग्रन्थागारो में इसे अनिवार्य करने के साथ कक्षा आठ में ब्राह्मी लिपि चंद्रिका साहित्य की जानकरी व इस प्राचीन लिपि के बारे में एक विस्तृत पाठ संकलित करने का भी आदेश जारी कर दिया।ताकि राज्य के विद्यार्थी इस श्रेष्ठ प्राचीन लिपि का बोध कर सके

पंच भाषा व ब्राह्मी लिपि के विज्ञ पूज्यपाद आचार्य श्री सुनिलसागर जी गुरूराज द्वारा मार्दर्शित व भारतीय विद्यापीठ द्वारा प्रकाशित यह ‘ब्राह्मी लिपि चंद्रिका’ साहित्य प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ के द्वारा सिखाई गयी इस महान पुज्य लिपि के माध्यम से सम्पूर्ण विश्व में जैन दर्शन को गौरवान्वित करेगी।

शब्दसुमन-शाह मधोक जैन चितरी
नमनकर्ता-श्री सुनिलसागर युवासंघ भारत

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